शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

1.Madhu Singh : bevzah

  बेवज़ह

बेवज़ह  वो  रास्ते  भर  मुझसे यूँ  लड़ता रहा 
जब जुदाई होने लगी भर सिसकियाँ रोता रहा     
 
नफ़रतों  की आग में वो उम्र  भर जलता रहा      
पर  दुआएँ  माँग कर  हर रोज़ वह लाता रहा 

रिश्ते की नाज़ुक डोर में वो गाँठ ही देता रहा 
पर डोर रेशम की वह हर रोज़ ही कसता रहा 

दुश्मनी की ज़िद में वो कुछ न कुछ कहता रहा   
पर प्यार का दरिया लिए पास वो फिरता रहा 

क्या बताऊँ नाम उसका दिल से दुआ देता रहा 
लड़ते लड़ते बारहां बस वो प्यार ही करता रहा 

हो  गया  पागल  बहुत  अब  चाहने  वाला  मेरा 
ऊँगली पकड़ चलने की ज़िद पर रोज़ लड़ता रहा 

                                                    मधू "मुस्कान "