बुधवार, 20 मार्च 2013

मधु सिंह : इधर मौत ने छुआ

  
इधर  मौत  ने  छुआ
         
         
 जब भी छुआ है मौत ने बड़े प्यार  से छुआ 
 है किसकी बद्दुआ यह,है किसकी यह दुआ
   
 छोड़ी  नहीं  है  हमने अभी दामने -उम्मीद  
 कत्बों  पे लिख दिया मेरे मक्तूल की दुआ  

 कुछ  दूर  ही चला  था  ले  तिश्नगी लबों पर 
 लम्हाते  -  तीरगी  ने   बड़े  प्यार  से  छुआ 

  ये   इश्क़े   जुस्तजू  थी  या  हुश्ने  - गुफ्तगू 
  मेरा  चाहने  वाला  ता -उम्र मेरा नहीं  हुआ 

 ज़ज्बात   ज़िन्दगी   के   यूँ   खामोस  हो गए 
   उधर वो क्या  गया कि इधर मौत  ने  छुआ 

 कत्बों -समाधि   लेखों , मक्तूल - जिसका  क़त्ल  हो , तीरगी -अंधेरा 
                                          मधु """ मुस्कान "

      
       
    
        
       
     
     

     


    

16 टिप्‍पणियां:

  1. लाजबाब,बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति.

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  2. ये इश्क़े जुस्तजू थी या हुश्ने - गुफ्तगू
    मेरा चाहने वाला ता -उम्र मेरा नहीं हुआ

    बहुत खूब क्या बात है .फाग मुबारक .फाग की प्रीत और रीत मुबारक .

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  3. बहुत उम्दा ग़ज़ल लिखी है आपने,
    मुबारकवाद!

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  4. लाजबाब, उम्दा ग़ज़ल***** गहनतम अनुभूति एवम परलौकिक सत्ता के
    प्रति समर्पण के साथ इहलौकिक व्यथा का चरम
    एवम परम विन्दु

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  5. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  6. ये इश्क़े जुस्तजू थी या हुश्ने - गुफ्तगू
    मेरा चाहने वाला ता -उम्र मेरा नहीं हुआ
    बहुत उम्दा
    वो जो इश्क था वो जूनून था
    ये जो हिज्र है ये नसीब है

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  7. बहुत उम्दा...हर शेर दिल को छू गया...

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  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  9. यही तो इब्तदा और इन्तहां है

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  10. 'जब भी छुआ है मौत ने बड़े प्यार से छुआ।
    है किसकी बद्दुआ यह,है किसकी यह दुआ।।' सार्थक और उत्कृष्ट वर्णन। जिनको मौत प्यार से छू रही है वे नसिबवान माने जा सकते हैं।

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