गुरुवार, 21 मार्च 2013

मधु सिंह : तेरा शाना न था

         तेरा शाना न था 

   उफ़,    मेरी    वफ़ात   पे ,  तेरा  शाना  न था              
   जब   मेरी   मैयत   उठी,  मेरा  दीवाना न था 

    फ़ज़ा  में यूँ ही नहीं  नीलम हो  गईं  सांसे मेरी 
    मौत की खामोशियाँ  थी, उसका  आना न था 
    
    चन्द    रोज़ा   और   भी  जी  लेते   उधार में 
     ये मेरी  बेचारगी  थी  , मेरा   परवाना  न था 

    अफ़सोस,   तमाम   उम्र   मैं   मुंतज़िर  रहा               
    ये अज़ाब था ख़ुलूस का,मौत का आना न था 

    मुद्दतों ढूँढ़ा करेंगीं मेरी जूस्तजू,मेरी ख्वाहिशें
    ज़ुर्म था  ज़मीर   का , यूँ हीँ मेरा जाना न था 

    दो गज़ जमी भी न मयस्सर हुई उल्फत को 
    मेरे गुनाह थे,मेरा ज़ुर्म था,मेरा दीवाना न था

    वफ़ात - मौत , शाना -कन्धा , मुन्तज़िर -प्रतीक्षा रत ,
    अज़ाब -मुसीबत , ख़ुलूस -सच्चाई

                                            मधु "मुस्कान"