शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

मधु सिंह : बहा आँखों से पानी है

   बहा आँखों से पानी है 
 
 
  बचे   हैं   चीथड़े   तन   के   गुनाहों   की   कहानी  है 
  कहीं   उफ़नी   जवानी   है  कहीं   गंगा   का पानी है 

  नज़्ज़ारे अज़ीब हैं  ख़ुद -ब-  ख़ुद  बंद  हो  गईं आँखें 
 हया  जब- जब गिरी  नाली में  बहा आँखों से पानी है 

 धब्बे   खूँ  के  न  धुल   सके  लाख  बरसातों  के बाद 
 माथे   पर   लगे   धब्बों  की  बड़ी  लम्बी  कहानी  है  

 उनको   मालूम  न  था    जिश्मे-  दौलत  की कीमत
उफ़ , चंद   सिक्को  पे   थिरकती  जिश्मे  - जवानी है

या   रब ये  दुनियाँ  है   तुम्हारी  या  खूँ   की दरिया  है
जहाँ  देखो  ज़िधर  देखो जिश्मे-तिज़ारत की कहानी है 
                                                  मधु "मुस्कान"