सोमवार, 1 जुलाई 2013

मधु सिंह : न वो आए न नींद आई



      न  वो आए न नींद आई 


 न    वो   आए ,  न   नींद  आई ,  न  ख्वाब आए 
कौन   है  मेरी  पलकों  में  इस कदर समाया हुआ 

रस्में  -  सितम   एक   नहीं   हज़ार   थीं   लेकिन 
है  कोई   लबे-  खामोशिओं  से  ज़ुल्म  ढाया हुआ 

बात   दीगर  है  कि  न  वो  सनम  है न ख़ुदा मेरा 
है वो क्या मेरा जो  इस तरह है दिल पे छाया हुआ 

गुज़री मेरी भी और उसकी भी , गुज़र भी जाएगी 
है ज़िगर पे  चोट कहीं  वो गहरा बहुत खाया हुआ 

शब-ए- इंन्तिज़र ,सहरे-जुनूं के ज़लज़ले तो देखो 
है  किसी यार की आँखों में जाम पी के आया हुआ 

है क्या हुआ उसे, मेरे दिल पे हज़ार ख़राबी गुज़री
कि दिले-कू-ए-यार में है एक ज़लज़ला आया हुआ 

                                     मधु "मुस्कान"