रविवार, 4 नवंबर 2012

8. मधु सिंह: पागल

     

    पागल 
जब  से  तुमसे   प्यार  किया  है  
हर वख्त  ही मैं  खोई  रहती हूँ 

दर्द प्यार का, इतना गहरा होगा
मै छुप-छुप बस  रोती  रहती हूँ 

क्यों  दूर  गये,  क्यों  भूल  गये 
बन  आँसूं  बस  बहती  रहती हूँ


प्यार की चाहत,  चाह- चाह  कर 
मत पूछों, मर-मर जीती रहती हूँ 

कहते हैं प्यार बहुत मीठा होता है 
मै  तो  बस यूँ हीं  तड़पा  करती हूँ

अश्रु  बूंद की  बन-बन   सरिता 
अबिरल, उर मध्य बहा करती हूँ 

आ जाओ मेरी  बाँहों में अब तुम 
बस यही सपन मै  देखा करती हूँ 

कब आओगे तुम कुछ तो कह दो 
बन  पागली बस फिरती रहती हूँ  

पागलपन  की  हद से गुजर कर
मत पूछों मै कैसे जीती  रहती हूँ 


                          मधू "मुस्कान"