शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

मधु सिंह : तमाम उम्र अकेले लड़ी हूँ मुफलिशी से





ज़िन्दगी यूँ  हीं नहीं मिली है मुझे, ख़ुशी-ख़ुशी से
तमाम उम्र मैं अकेले लड़ी हूँ, मुफलिशी से

ये रौनक जो मेरे चेहरे  पे,  चल के आई है
फ़तह  हासिल  हुई है जंग  में , खुदकशी से

तीरगी उजालों का क़त्ल करनें पे आमादा थी 
मेरे इरादों ने जंग जीत ली, ख़ुशी-ख़ुशी से

खोया है ज़िन्दगी ने बहुत कुछ, ज़मानें को पता है 
मगर फ़तह हुई है मेरी , बड़ी दिलकशी से

फुलझड़ी न समझ मुझे मैं इक धमाका हूँ
दोस्ती बहुत पुरानी है  मेरी ,आतिशी से  

                             मधु "मुस्कान"