शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

56.मधु सिंह : टकसाल



            टकसाल
   
     
     

   
     पीढ़ियाँ,   इस   देश   की   खाक   में   मिल  जायगीं 
     जिस्म को  टकसाल  समझने का  नज़रिया  छोड़िये    
    
     गर  मंडियाँ  सजती रहेगीं  जिस्म  की इस मुल्क में
     अस्मिता  की   बात  करना  भूल  कर  मत  सोचिये   

    सिक्के  कितने दिन तक ढलेंगे जिस्म के टकसाल में 
    बे-शर्मिओं   को   ख्वाब  में   आने  से   बेशक  रोकिए
 
     जिस्म   की   जागीर   पर   पहरे   लगाना   है  जूरुरी  
     जिस्म की  बोली लगाने की घटियाँ कवायद  छोड़िए  

    धरती- गगन  में  चित्र  मर्यादा  का  बिम्बित  हो उठे 
    है करबद्ध  निवेदन आप से  कुछ काम ऐसा  कीजिए       

    गर मर्यादा का आंचल आप का  भूल से भी खुल  गया  
    अस्मिता जल जायगी , पशुता का विसर्जन कीजिए 
         
                                                       मधु "मुस्कान "