गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

66.मधु सिंह : प्रणय की वीथिका


             प्रणय की वीथिका
 

           तुम   प्रणय  की  बीथिका  से , प्यार  के  संदेस लिखना
           कर  प्रफुल्लित  ह्रदय अपना ,प्यार से  तुम पुष्प चुनना

           ह्रदय  के हर  पृष्ठ  पर  तुम, हर्ष  मिश्रित भाव लिखना
           मै लिखूं मनु तुझे ,तुम प्यार से श्रद्धा सृजन की लिखना

           तुम सृष्टी के नव सृजन का एक नया इतिहास लिखना
           मै प्यार की गरिमा बनू ,तुम प्यार का मधुमास लिखना

           मै बनू एक धवल गंगा ,तुम प्यार का हिमताज बनना
           मै  प्यार  की  भाषा बनू, तुम  हृदय  का भाष्य लिखना 

           मै धरा की गाथा लिखूँ ,तुम व्योम का विस्तार लिखना 
           मैं बनू ममता का आँचल , माँ  का तुम  प्यार   लिखना

           मैं  क्षितिज  की  सहचरी  ,तुम  मेरा  अवलम्ब  बनना
           कर   सुसज्जित  स्वयं  को ,तुम  मेरा  आभास  बनना

           मै  प्यार  की   ऊँचाईयाँ , तुम  प्यार का सोपान बनना
           मै  बनू  पथ  गामिनी, तुम प्यार-पथ का  श्रृंगार बनना

           मै  रहूँ  बाहु  पास में आलिंगित ,तुम  आलिंगन करना
          मै विष उदधि के गर्भ की ,बन शिव तुम विष पान करना
                                                              मधु "मुस्कान "                    
         
         
           
          
          
       
       
       

14 टिप्‍पणियां:

  1. अर्थपूर्ण , अति सुंदर पंक्तियाँ

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  2. भाव, भाषा ,शब्द विन्यास ,मर्यादा,संस्कृति,सृजन की दृष्टि से अतुलनीय और खूबशूरत प्रस्तुति,मधु जी,इस रचना के लिए दिल से बधाई!!!

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  3. मैं क्षितिज की सहचरी ,तुम मेरा अवलम्ब बनना
    कर सुसज्जित स्वयं को ,तुम मेरा आभास बनना

    मै प्यार की ऊँचाईयाँ , तुम प्यार का सोपान बनना
    मै बनू पथ गामिनी, तुम प्यार-पथ का श्रृंगार बनना
    सुन्दर प्रस्तुति . बहुत ही अच्छा लिखा आपने

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (16-02-2013) के चर्चा मंच-1157 (बिना किसी को ख़बर किये) पर भी होगी!
    --
    कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
    सादर...!
    बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ!
    सूचनार्थ!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. ये विजेट सफलतापूर्वक अपने ब्लॉग पर स्थापित करने के बाद "टिप्स हिंदी में" ब्लॉग पर टिप्पणी अवश्य दें |

    बहुत सुन्दर उद्गारों की अभिव्यक्ति हुई है गीत में -बीन में तेरी ,तू झंकार बनना,रागिनी मैं तू गायंहार बनना ,रागिनी मैं बनूँ तू साज़ बनना .प्रीत मैं तू प्रीत का उपहार बनना .थाती बनूँ मैं तू साहूकार बनना .

    बसंत मुबारक .

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  6. सुन्दर प्रस्तुति |
    आभार आदरेया |
    सादर नमन

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