शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

57.मधु सिंह : मोहब्बत करूँगीं मगर धीरे- धीरे

         
                                                                                                                                                      
     
            मोहब्बत करूँगीं  मगर धीरे- धीरे 

     चाहूँगीं  जी  भर  मेरी जान  तुमको  ,सफ़र  में  रहूँगी  संग संग तुम्हारे
     रुकेंगें,  मुड़ेंगे,  एक  साथ   हम   तुम , चलेंगें   मगर, दोनों    धीरे -धीरे

      लिखेंगें  मोहब्बत  पढेंगें  मोहब्बत, सुनेगें  मोहब्बत  कहेंगें  मोहब्बत  
      माथे  की  बिंदियाँ  बनेगीं मोहब्बत ,चमकेगी बिंदिया, मगर धीरे -धीरे 

     साहिल  भी  होगा समंदर भी होगा, लहरें  भी  होंगीं  सहारा  भी होगा     
     नज़रें  भी  होंगीं  नज़ारा  भी  होगा, बोलेगा  कंगना,  मगर  धीरे -धीरे 


     सपने  भी होंगे   हकीकत भी होगी ,कहानी  भी होगी जमाना भी होगा                        
     रस्में  भी   होंगीं  रिवाजें   भी  होंगी , शर्माएंगें   हम,  मगर  धीरे -धीरे 

     गगन   भी  हंसेंगा   धरा  भी  हंसेंगीं ,चंदा  भी   होगा  सूरज  भी होगा
     गुफाएँ   भी   होंगीं   पर्वत  भी  होगा ,चलेंगें  गुफा  में  मगर  धीरे -धीरे 


     बाहें  भी   होंगीं  सहारा   भी   होगा ,रंगों  का  सुन्दर  नज़ारा  भी होगा 
     पकड़  हाथ  हम तुम संग संग चलेंगें ,बाँहों में  आऊँगी मगर धीरे -धीरे 

     गरारा   भी  होगा   शरारा  भी  होगा ,चुनरी  भी   होगी  लहँगा  भी होगा 
     लिखेंगें   मोहब्बत  दुपट्टे  के  कोने पे  ,चूनर   हिलेगी  मगर  धीरे -धीरे 

      पायल  भी   होगी  कंगना भी होगा , नथुनी  भी  होगी करधन भी होगी 
       नथिया  भी   होगी  झूमर भी  होगी  ,बोलेगी   पायल  मगर  धीरे -धीरे   

      ताजे  मोहब्बत  के  किस्से  भी   होंगें,  मुमताज   होगी  मेरी  सकल में
      बड़े   प्यार  से वो  मेरी  माँगें  भरेगें ,  लगाएंगें   सिंदूर  मगर  धीरे -धीरे 

       चकवा  भी  होगा चकवी  भी होगी सांसों की धड्कन में  खुशबू भी  हेगी       
      चेहरा   भी   होगा  घूँघट  भी   होगा  , उठाउंगीं   घूंघट   मगर  धीरे -धीरे

      अपनी अलग एक दुनिया भी होगी मोहब्बत का अपना तिरंगा भी होगा 
      जर्रे -जर्रे पर उसके मोहब्बत लिखेंगें ,लहराएगा तिरंगा मगर धीरे -धीरे 
                                                                                      मधु  "मुस्कान "
   
      

                


7 टिप्‍पणियां:

  1. मगर धीरे धीरे,बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती।

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  2. चकवा भी होगा चकोरी भी होगी सांसों की धड्कन में खुशबू भी हेगी
    चेहरा भी होगा घूँघट भी होगा , उठाउंगीं घूंघट मगर धीरे -धीरे,,,,,

    वाह वाह ,,,बहुत शानदार सुंदर प्रस्तुति,,,

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  3. रस्में /शरारा /करधनी /शकल /ख़ुश्बू /चकवी

    हवा धीमी होगी खुला आसमां भी ,
    उड़ेगी पतंग प्रेम की धीरे धीरे ,बहुत खूब सूरत भाव चित्र .आभार आपकी सद्य टिपण्णी का .
    ram ram bhai
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    रविवार, 3 फरवरी 2013
    असली उल्लू कौन ?

    नुसखे सेहत के
    नुसखे सेहत के

    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  4. बाहें भी होंगीं सहारा भी होगा ,रंगों का सुन्दर नज़ारा भी होगा
    पकड़ हाथ हम तुम संग संग चलेंगें ,बाँहों में आऊँगी मगर धीरे -धीरे
    ,बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती।
    New post बिल पास हो गया
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  5. लिखेंगें मोहब्बत पढेंगें मोहब्बत, सुनेगें मोहब्बत कहेंगें मोहब्बत
    माथे की बिंदियाँ बनेगीं मोहब्बत ,चमकेगी बिंदिया, मगर धीरे -धीरे

    ....वाह! ख़ूबसूरत अहसासों को पिरोये बेहतरीन ग़ज़ल...

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