शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

मधु सिंह : गिर -गिर कर उठते देखा है

 
 
  

अग्नि  सरीखे  पगडण्डी पर
विरही चकई की अश्रु धार सी  
अपनी ही आँखों से टप-टप कर
मैंने  तुमको गिरते देखा है
गिर-गिर कर उठते देखा है
उठ-उठ कर गिरते  देखा है  ||1 ||

विरह अग्नि की व्यथा समेटे

ध्वनि विहीन नंगें पावों से
निशाकाल की छाती पर
मैनें तुमको  चलते देखा है 
मैनें तुमको गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||2 ||

एक नहीं कितनी रातों को

मरुथल की तपती छाती पर
भीषण ज्वाल सी तप्त रेत पर
तड़प-तड़प  कर चलते देखा है 
मैंने तुमको गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||3 ||

ले  दावानल की मर्माहत पीड़ा

त्याग निलय की मोह व्यथा को
गिरि गह्वर के द्वार -द्वार पर
व्यथा -कथा  कहते देखा है 
तुमको मैंने गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||4 ||
 
त्ररयम्बकेश्वर की तीसरी आँख से
निकली  महाकाल की ज्वाला में
पल -पल तुमको जलते देखा है
जल-जल कर  मरते देखा है 
मैंने तुमको गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||5 ||

खजुराहों की प्रतिमाओं में

शंकर के  त्रिशूल  के ऊपर
शीर्ष  नुकीले मध्य भाग पर
तुमको मैंने  चलते देखा है 
मैंने तुमको गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||6 ||

 हिम शिखरों के विस्तृत वितान पर

 भीषण जाड़ों की मध्य रात्री में
निर्जन वन उपवन के भीतर
अपने से ही  बतियाते  देखा है 
मैंने तुमको गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||7||
 
ज्वालामुखी के शीर्ष विवर पर
लावा की भीषण ज्वाला में
मैंने तुम्हे पिघलते देखा है 
मैंने  तुमको जलते देखा है
मैंने तुमको गिरते देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||8||

 फिसलन भरी जमीन सरीखे

 हरित कांति के शैवालों पर
मैंने तुम्हें फिसलते देखा है
सम्हाल -सम्हल  कर  चलते देखा है 
मैंने तुमको   गिरते  देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||9 ||

 बन कस्तूरी  मृग सा पागल 

 मादक रस में जलने वाले 
 अपने ही आगे पीछे 
मति भ्रमित  तुम्हे  होते देखा है 
मैनें तुमको  गिरते  देखा है
गिर -गिर कर उठते देखा है ||10 || 

बाबा नागार्जुन के चरणों में 
उन्ही का अनुकूलन                          मधु "मुस्कान"