बुधवार, 29 मई 2013

मधु सिंह : बे-नकाब होने को है

     बे-नकाब होने को है
      
     सज़ा   बे- वफ़ाई   की   आता  होने  को  है
     शौके  -  फ़ितरत   की   कज़ा   होने  को है

    नरगिस   की   बेनूरी   सदा   देती  रह  गई
    जल्वये  -  नूरी    बे  -  नकाब   होने  को है

    नक्श   है   जिश्म  पे   लाखों   श्याह   दाग
    धड़  पेशवा  का  सर  से  अलग  होने को है 

    ख्वाबे -महफ़िल  रोज  सजती  है अँधेरे में
    सारी  दुनिया  को   अब  खबर  होने  को  है
   
    खोल  कर  सन्दूक पढ़ लिये  सारे खतों को
    डाकिये  को   अब  जल्द  सज़ा  होने  को है 

    बेशक सज़ा गुनहगारों को मिलनी चाहिए
   जल्द ही एक नाम फ़िर सुर्खी में होने को है

                                  मधु"मुस्कान"