शनिवार, 8 दिसंबर 2012

21.Madhu Singh : Shabdon Ke To Arth Kho Gye

        शब्दों के तो अर्थ खो गए


      इंद्र धनुष  का  रंग  उड़  गया ,  भाव  सभी जल  दुराचार   हो गए
      शब्दों के तो खाल  नुच  गए  ,रिश्ते  खुद में ही  व्यभिचार  हो गए 

      खो गया अर्थ  भाई का अब ,  अब भाई ? ड्रामे के किरदार हो गए  
      है  पता आज  इसका सबको , भाई ही  जिश्म के दावेदार हो गए 

      कहते तो  हैं वो  पिता तुल्य  है, पिता  शब्द  निर्वसन  हो  गए     
      शब्द  फिर  रहे अर्थ  खोजते  रिश्ते सब  खुद  ही व्यापर हो गए

      बहन शब्द कितना पावन है पर इसके अर्थ  भाव सब नर्क हो गए 
      दुराचार के चरम बिंदु बन अब , रिस्ते इश्क के नंगे बाज़ार हो गए 

     रोज सुनाई  देते किस्से, कब कहाँ चीर किसकी कितनों  ने हर ली  
     क्या देखें क्या सुने  आज हम  रिश्तों  के तो  अब तार-तार  हो गए

    किस्से एक नहीं, दो -चार नहीं ,यत्र तत्र  सर्वत्र कई  हज्जार हो गए 
    गुरू ज्ञान सब अर्थहीन हो गए, रिश्ते  नंगेपन के हथियार   हो गए

    होठ, तबस्सुम, आँखे, चेहरे, शर्म, हया  सब के सब ब्यापार हो  गए
    शब्दों के तो अर्थ खो गए रिश्ते  हो  निर्वस्त्र  घृणित  उपहार हो गए 

                                                                  मधु  "मुस्कान "