मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

22.मधु सिंह : झूठा मुकदमा

           झूठा  मुकदमा    


बन मुकदमा एक झूठा खुद जिन्दगी से लड़ती रही
खुद बनी अपना वकील  ख़ुद से  ज़िरह  करती रही

ख़ुद बनी मुज़रिम  इल्जाम  ख़ुद पर  ही लगाती रही
बेडियाँ पावों में डाले अपने, ख़ुद को तलब करती रही 

ख़ुदा जाने  अदालत में कैसे ख़ुद निर्वसन  होती रही 
क़त्ल,कातिल,खून,खंज़र,जज ख़ुद ही  मैं बनती रही


खुली इज़लास में मुन्सिफ की, मै किस कदर रोती रही 
हर जगह मैं ही दिखी बस बन इलज़ाम एक जीती रही 

लगे धब्बे जो माथे पर देख उसको किस तरह जीती रही 
ज़िदगी की राह में बन कालिमा मै घुट घुट के मरती रही

क्या इल्ज़ाम दूं तक़दीर को अपनों से ही मै छलती रही
ज़िन्दगी हो गई खामोस बस बन अपना लहू बहती रही 

                                                  मधु "मुस्कान"