शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

मधु सिंह : फिर लौट के आना है दुनियाँ में मुझको



                               



                                (1)
   जिश्म  की दौलत की कभी कीमत नहीं होती
   दिल की दौलत से मोहब्बत की हिना बनती है
                                (2)
 रौनके  - ज़न्नत  न  कभी  रास  आई मुझको
फिर लौट के दोबारा आना है दुनियाँ में मुझको
                               (3)
जो अंजाम हो बेहतर वो ख़ुशी है गंवारा मुझको
फ़कत आगाज बेहतर  होने  से  कुछ नहीं होता 
                               (4)
मुझको  मालूम है ज़न्नत की  हकीकत  लेकिन 
मुझको रास आता है दुनियाँ से मोहब्बत करना
                                (5)
 कहाँ तक फ़ासला मिटाओगे दुश्मनी का मेरे दोस्त
 हमने  तो  दुश्मनों  से  दोस्ती का हुनर सीख लिया 


                                             मधु  "मुस्कान "

रविवार, 17 अगस्त 2014

मधु सिंह : तनख्वाह में मिली इक लम्बी जुदाई है








 मेरी  नौकरी  है इश्क की  मोहब्बत  कमाई है
 तनख्वाह  में   मिली   इक  लम्बी  जुदाई  है

खाव्बों  में   सही   उनसे   मुलाकात   हो गई
मेरे हाथो में जरा देख तेरी  नाज़ुक  कलाई है

बिस्तर  की  सलवटों  से  एहसास  हो  रहा है
मोहब्बत  नें   आज  अपनी   बरसी  मनाई है

ये हिज्र भी क्या चीज है के जगाता है रात भर
एक  हिज्र  ही  तो  मेरी  सारी  पूँजी कमाई है 

इक आवाज  उभरती  है  दरिया की ख़मोशी से
इश्क  ने  ही  लाखों  घरों की  बत्ती  जलाई  है


इरशाद   खान  भाई  तुमनें  ये  सच   लिखा है 
"जब  भी  चलाई  इश्क  ने  अपनी  चलाई है "

                                             मधु  "मुस्कान "

रविवार, 10 अगस्त 2014

मधु सिंह : उठो कलम हुंकार भरो तुम ( स्कॉटलैंड से )

             




                     ( दिनकर जी को  समर्पित)
                   



उठो ! कलम  हुंकार  भरो तुम,आज तुझे कुछ लिखना होगा
एक नहीं अगणित तूफानों में,बन  महाकाल  चलना   होगा


खो गये  कहाँ सपने अशोक के
है  नहीं  पता  कुछ   गौतम का
सारनाथ  के  भग्नावशेष  क्यों
भूल   गये    भाषा   गौतम  की
कुशीनगर  व्याकुल है  कितना
खो  गई  कहाँ  लिक्षवी  हमारी
स्तब्ध  हो  गये स्तूप साँची के
क्यों मधुबन  शमशान हो गये
कलम ,आज तुम कुछ तो बोल

उठो कलम हुंकार भरो तुम,आज तुझे कुछ लिखना होगा
एक नहीं अगणित तूफानों में,बन महाकाल  चलना होगा


भाल  झुक गया आज कुतुब का
क्यों न फट गई छाती ज़ईफ़ की
रो रहा ताज क्यों यमुना तट पर
छुप -छुप रोती मुमताज  बेचारी
जलते  नही  दिये  अब  दिल में
खो  गई लालिमा  लालकिले की
जल जल कर बुझ गए दिये क्यों
बुझ गए तक्षशिला के ज्ञान दीप
कलम ,आज तुम कुछ तो बोल


उठो कलम हुंकार भरो तुम,आज तुझे कुछ लिखना होगा
एक नहीं अगणित तूफानों में,बन महाकाल  चलना होगा


बुझ गये दीप क्यों नालन्दा के
भारत  माँ  की  बक्ष बिध गया
साकेत  जल   रहा  धू -धू कर
कबिरा  का  कुछ  पता   नहीं 
चुप कलम हो गई  तुलसी  की
रहीमन  रो    रहा       अकेला  
कहाँ गए जयशंकर , दिनकर
कहाँ  गया   प्रताप  घाटी  का
कलम ,आज तुम कुछ तो बोल



उठो कलम हुंकार भरो तुम,आज तुझे कुछ लिखना होगा
एक नहीं अगणित तूफानों में,बन महाकाल  चलना होगा


नहीं बच  सकी   शान झाँसी की
खड़ा कुँवर गढ़ रो रहा भाग्य पर
दुर्गादास  न पैदा होते अब क्यों
कहाँ खो  गया  राणा  का चेतक 
मेवाड़   तेरा   बलिदान   कहाँ हैं

खो गया कहाँ  भारत अतीत का
शेखर   का   बलिदान   खो गया
भगत  भागता  घूम रहा  है क्यों
कलम ,  आज तुम कुछ तो बोल

 उठो कलम हुंकार भरो तुम,आज तुझे कुछ लिखना होगा
एक नहीं अगणित तूफानों में,बन महाकाल  चलना होगा


बोलो!रावी,सतलज,चेनाब,सिन्धु
धवल -नीर  क्यों   लाल  हो  गया
अरे भागीरथ, तुम  कुछ तो बोलो
फिर  कब  अवतार धरा पर लोगे  
माँ   गंगा   के    महारुदन     पर 
कब  आकर  नव  काव्य लिखोगे
कहाँ   हो  गई  लुप्त    सरस्वती 
कहाँ   खो  गई  शान   सरयू  की 
कलम ,  आज  तुम कुछ तो बोल

उठो कलम हुंकार भरो तुम, आज तुझे कुछ लिखना होगा
एक नहीं अगणित तूफानों में, बन महाकाल  चलना होगा

                                                                           
                                                                               मधु " मुस्कान "






शनिवार, 2 अगस्त 2014

मधु सिंह : फूँक-फूँक चलती न जवानी



                             ( ब्रिटेन की धरती से )

जब गिर- गिर दहाड़ते   शैल-श्रिंग  भूचाल  धरा पर आता है
पड़ गए जिधर दो डग-मग पग  ज्वाल   विवर  फट  जाता है

फूँक-  फूँक  चलती  न  जवानी *  झंझा  तूफानों  से बचकर
जब   साहस  अपनी  ऊँगली   पर  पौरुष  का    भार उठता है

चढ़-  चढ़ जुनून  की छाती  पर जब  स्वाभिमान टकराता है
इतिहास तो क्या भूगोल युगों  का पल भर में बदल जाता है

क्या  हैं  न  पता  यह  तुझको  मैं   मूक  नहीं  युग बाणी हूँ
चलती  जब -जब  हुंकार  लिए  तब  व्योम  धरा   थर्राता है

रे  वर्तमान  के हठी समय ! तेरा यह कैसा इंगित आवाहन
तू  सम्हल   जरा  पौरुष   अजेय  द्वार   खड़ा  मदमाता है

  * दिनकर जी की पंक्ति                                                
                                                          मधु "मुस्कान"

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

मधु सिंह : हूँ -हाँ से काम अपना चलाने लगे है

            ( रीडिंग :थेम्स की घाटी से )
            

इस कदर लोग मुझको सताने लगे हैं 
हकीकत   भी  उनको  फ़साने  लगे हैं

रात-दिन बात करने से जो थकते न थे
अब  वो  हूँ- हाँ से काम  चलाने लगे हैं 

वो जो चेहरे थे जिन पर भरोसा किया 
उनको  अपनों के  चेहरे  बेगानें लगे हैं

मेरे ख्वाबों की दुनियाँ के जो किरदार थे 
वही   किरदार मुझको   रूलाने  लगे हैं

मैनें मोहब्बत भी की  है खरामे -खरामें
ये समझने  में  उनको  ज़माने लगे है

                        मधु "मुस्कान "

          
    





गुरुवार, 10 जुलाई 2014

मधु सिंह : कामना के पुष्प (थेम्स की घाटी,यू .के.से )



जब  गीत  मय   अस्तित्व  दोनों  के  मिलेंगें
सुरभित  कामना के  पुष्प  अधरों  पे खिलेंगें

नील    नभ     पर    चांदनी    इर्ष्या   करेगी
जब  बाहु- भुज में  आबद्ध  हम धू -धू जलेंगे

पहन   कुसुमों   के  बसन   जब   हम  हसेंगे 
नील नभ के  निर्मल  हृदय में हलचल करेंगे

जब  ले  विभा  की  ज्योति  हम  चंचल  बनेगें  
हिम शैल-शिखरों पर तुहिन कण चुम्बन करेंगे

रे दामिनी ! जिस  ठौर  हम आलिगन  करेंगे 
त्रिपथगा के पुण्य जल से देवगण तर्पण करेगे


                                     मधु "मुस्कान "         




शनिवार, 14 जून 2014

मधु सिंह : झूल जाऊँगी मैं (साउथ वेल्स यू .के. से )

 अपनी पलकों पे सपने सजाऊँगी मैं
 चाँद  तारों को  घर पर  बुलाऊँगी मैं

 इस कदर आप  मुझसे न  रूठा करे
 अपनी बाँहों में भर-भर मनाऊँगी मैं

 रूठने  की  अदा  आप  की  देख कर
 मन -  ही -  मन     मुस्कराऊँगी मैं

 चाहतें आप की दिल पे काबिज मेरे
 आप  की  चाहतों  को  सजाऊँगी मैं

आप ने इसकइ दर जो इनायत है की
जकड़ बाँहों में अपने झूल जाऊँगी मैं 

सेज सूनी बिलखती  न  रहेगी कभी
सेज पलकों  पे अपने  बनाऊँगी  मैं

                         मधु "मुस्कान "