बुधवार, 9 जनवरी 2013

42. मधु सिंह : पथिक

   


          पथिक 


      मैं पथिक प्रिये  तुम पथ बनना
      पग-पग  तुम  साथ मेरे चलना 
      सुख  दुःख में  साथ  मेरे रहना 
      तुम जी भर प्यार मुझे  करना 

      मेहंदी  में  मेरे  तुम  ही  रचना
      मेरे  माँग की  लाली तुम बनना
      मेरी सांसों में खुशबू बन बसना 
      तुम जी भर प्यार मुझे   करना  

     जब धूप दिखे तुम छाया बनना 
     मैं  बनू  पुष्प  तुम  भौरां  बनना
     मैं,  बनू  बाग  तुम माली बनना 
     तुम जी भर प्यार मुझे  करना 

     मैं,  लमहा  तुम  सदियाँ  बनना 
     मैं दिल,तुम उसमे धड़का करना 
     मेरे   सीने  में  तुम  चलते रहना  
     तुम जी भर प्यार मुझे  करना 

     मै, दिया बनू तुम  बाती  बनना
     तुम संग-संग साथ  मेरे जलना 
     मिल  साथ जिया  मरना करना
     तुम  जी भर प्यार मुझे  करना 

     जब चले हवा तुम आंचल बनना 
     मेरे  जिश्म से तुम  लिपटे रहना
     गर  मैं  राधा तुम कान्हां  बनना 
     तुम  जी भर प्यार मुझे   करना

     मैं,  सारनाथ  तुम  गौतम बनना 
     बस  निस्छ्ल उपदेश दिया करना
     मै प्यार बनू तुम परिभाषा बनना 
     तुम जी  भर  प्यार  मुझे  करना 

     मैं मुस्कान बनू तुम हंसना बनना
     मैं,  चाह  बनू  तुम  चाहत  बनना
     मैं प्राण ,प्रिये तुम  जीवन  बनना  
     तुम  जी  भर  प्यार  मुझे  करना  

     जब  साँस मेरी टूटे  तुम हठ बनना 
     पुरुषों की  तुम नव  सावित्री  बनना 
     हर सौहर को यह  बतलाया करना 
     तुम  जी  भर  प्यार  मुझे करना 

      यमराज दुष्ट को समझाया करना  
      तुम उसपे प्रतिबन्ध लगाया करना 
      भय  मुक्त मुझे  तुम जीया करना 
      तुम  जी  भर   प्यार मुझे   करना 


     (चलते चलते  इस वादे के साथ मिलते रहेंगें)
             
                                     मधु "मुस्कान "