सोमवार, 28 जनवरी 2013

51. मधु सिंह : कफ़न अपना बुने जा रही हूँ




         कफ़न बुने जा रही हूँ 


         बेटिओं  के  किस्से  लिखे  जा  रहीं हूँ 
        कफ़न  अपना   ख़ुद   बुने  जा  रही  हूँ

        कब  कहाँ  जल  उठे  बेटिओं  की चिता 
        बन अभागन का आँचल जिए जा रही हूँ 

        न   हया   है  बची  कहीं   देश  में  अब                              
        लाश,बन एक ,ख़ुद को  ढुले जा रही हूँ 

       नियम कानून की  धज्जियाँ उड़ रहीं हैं                                
       एक  जलती चिता बन जिए जा रही हूँ 

       कोख  से  ही बेबस  हो गई  बेटियाँ अब 
       जन्म  लेने के पहले  ही मरी  जा रही हूँ 

       सत्य को गरिमा मिले बेटियाँ हीं सत्य हैं 
      यही  अरमा  सजोए  मैं  जिए  जा रही हूँ    
     
         
                                        मधु "मुस्कान"

      

       
    
  

10 टिप्‍पणियां:

  1. कोख से ही बेबस हो गई बेटियाँ अब
    जन्म लेने के पहले ही मरी जा रही हूँ,,,,भावपूर्ण सुंदर अभिव्यक्ति,,,,

    recent post: कैसा,यह गणतंत्र हमारा,

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (30-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  3. भावपूर्ण रचना |"सत्य को गरिमा मिले बेटियाँ ही सत्य हैं "सुन्दर पंक्ति |
    आशा

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  4. बहुत सुंदर भाव
    अच्छी रचना
    बहुत सुंदर

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  5. बहुत ही मार्मिक एव उत्कृष्ट रचना,आभार।

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  6. कोख से ही बेबस हो गई बेटियाँ अब
    जन्म लेने के पहले ही मरी जा रही हूँ

    ...बहुत सटीक अभिव्यक्ति...रचना मन को छू गयी...

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  7. हमारे समय का एक विद्रूप और नाबालिग लम्पट सभी दर्द एक साथ लिए है त्यह रचना ,माँ -बाप की दुभांत भी ,


    कफ़न बुने जा रही हूँ



    बेटिओं के किस्से लिखे जा रहीं हूँ
    कफ़न अपना ख़ुद बुने जा रही हूँ

    कब कहाँ जल उठे बेटिओं की चिता
    बन अभागन का आँचल जिए जा रही हूँ

    न हया है बची कहीं देश में अब
    लाश,बन एक ,ख़ुद को ढुले जा रही हूँ

    नियम कानून की धज्जियाँ उड़ रहीं हैं
    एक जलती चिता बन जिए जा रही हूँ

    कोख से ही बेबस हो गई बेटियाँ अब
    जन्म लेने के पहले ही मरी जा रही हूँ

    सत्य को गरिमा मिले बेटियाँ हीं सत्य हैं
    यही अरमा सजोए मैं जिए जा रही हूँ

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  8. Virendra Kumar SharmaJanuary 30, 2013 at 3:42 PM
    हमारे समय का एक विद्रूप और नाबालिग लम्पट सभी दर्द एक साथ लिए है त्यह रचना ,माँ -बाप की दुभांत भी ,


    कफ़न बुने जा रही हूँ



    बेटिओं के किस्से लिखे जा रहीं हूँ
    कफ़न अपना ख़ुद बुने जा रही हूँ

    कब कहाँ जल उठे बेटिओं की चिता
    बन अभागन का आँचल जिए जा रही हूँ

    न हया है बची कहीं देश में अब
    लाश,बन एक ,ख़ुद को ढुले जा रही हूँ

    नियम कानून की धज्जियाँ उड़ रहीं हैं
    एक जलती चिता बन जिए जा रही हूँ

    कोख से ही बेबस हो गई बेटियाँ अब
    जन्म लेने के पहले ही मरी जा रही हूँ

    सत्य को गरिमा मिले बेटियाँ हीं सत्य हैं
    यही अरमा सजोए मैं जिए जा रही हूँ

    कफ़न अपना बुने जा रही हूँ
    @ Benakab

    जवाब देंहटाएं
  9. कोख से ही बेबस हो गई बेटियाँ अब
    जन्म लेने के पहले ही मरी जा रही हूँ ....कटु सत्‍य उजागर कि‍या आपने
    , बढ़ि‍या

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