शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

36.Madhu Singh : Khichadi

 
          खिचड़ी 



              अड़   गया है  जिद पे  अपनी, ज़ज गवाही के लिए
              ज़ख्म, ख़ुद कहानी  कह रहें हैं न्याय  के दरबार में

             ख़ुद को कहने लग गया  है, वो देवता है  न्याय का 
             पर  ,सब  सरीके  ज़ुर्म  हैं अब  न्याय के दरबार में

            कह रहा हर  शक्स जिसको , न्याय  की एक पालिका
           सौदा न्याय का  है  हो रहा , अब न्याय के  दरबार मे

           काले कपड़े  में वो  है अकड़ा,  दिख  रहा जो  मंच पर
           कल उसी ने मुह काला किया,बैठ,न्याय के दरबार में

           सर से लेकर पावं तक मुकम्मल सब  सरीके ज़ुर्म हैं  
          है लिख रहा जो फैसला बैठ, अब न्याय के  दरबार में

           कहावत "दाल मे काले"की  अब हो गई सदिओं पुरानी 
          है  खिचड़ी पक रही, काले दाल की,न्याय के दरबार में

          वो हमारी क्या हिफाज़त कर सकेंगें जो सरीके ज़ुर्म हैं
         खुला खेल,  सारा चल रहा  है, अब न्याय  के दरबार में  

                                                                   मधु "मुस्कान"