सोमवार, 18 मार्च 2013

69.मधु सिंह :निखर सी गई









 निखर सी गई 

 मुझे तुम  क्या मिले 
 एक बसर मिल गया 
 प्यार    ऐसा    मिला  
 मै    निखर   सी  गई 

हो खफ़ा तुमने मुझको
भुला      क्या      दिया  
 रेत   सहरा  का   बन
                                          मै   बिखर   सी   गई  
तुमने    नज़रें   मिला 
सर  झुका  क्या  लिया  
एक  बुझता दिया बन   
मै   तिमिर   हो   गई          

ओढ़ ली  तुमने  चादर 
खफीद्न     की    क्या 
जिश्म  से   रूह   मेरी  
निकल   उड़  सी  गई 

मेरी चाहत को तुमने
भुला    क्या     दिया  
बन  गवाही  मै,  खुद 
सामने  अड़  ही  गई

प्यार तेरा  क्यों मुझसे     
यूँ     जुदा    हो   गया   
जूनूने   हद  से  गुज़र 
मै    ढह    सी    गई

तुमने मेरी तरफ खुश
हो    निहारा  जो  क्या 
प्यार   की    रूह   बन 
जिश्म में उतर सी गई  

               मधु  "मुस्कान " 

 




 












     


  

 


18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर .बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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  2. वाह ...अनुपम भाव संयोजन ...
    आभार

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    1. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति,सादर आभार.

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  4. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....

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  5. बहुत सुन्दर प्यार की अनुभूति ,सुन्दर प्रस्तुति
    latest post सद्वुद्धि और सद्भावना का प्रसार
    latest postऋण उतार!

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  6. क्या बात है ?बहुत खूब कही है जो भी कही है .

    हो खफ़ा तुमने मुझको
    भुला क्या दिया
    रेत सहरा का बन
    मै बिखर सी गई

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  7. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (20-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  8. ओढ़ ली तुमने चादर
    खफीद्न की क्या
    जिश्म से रूह मेरी
    निकल उड़ सी गई

    उत्कृष्ट प्रस्तुति.

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  9. बहुत खूब मधु मुस्कान जी , दिल को छूने वाली
    खूबशूरत भावनाओं की सुन्दर प्रस्तुति *****^^^^^******* ओढ़ ली तुमने चादर
    खफीद्न की क्या
    जिश्म से रूह मेरी
    निकल उड़ सी गई

    मेरी चाहत को तुमने
    भुला क्या दिया
    बन गवाही मै, खुद
    सामने अड़ ही गई

    प्यार तेरा क्यों मुझसे
    यूँ जुदा हो गया
    जूनूने हद से गुज़र
    मै ढह सी गई

    तुमने मेरी तरफ खुश
    हो निहारा जो क्या
    प्यार की रूह बन
    जिश्म में उतर सी गई

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  10. तुमने नज़रें मिला
    सर झुका क्या लिया
    एक बुझता दिया बन
    मै तिमिर हो गई

    ...वाह! बहुत उम्दा अभिव्यक्ति...

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  11. ओढ़ ली तुमने चादर
    खफीद्न की क्या
    जिश्म से रूह मेरी
    निकल उड़ सी गई

    wah jabab nahi..behtareen..

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  12. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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