गुरुवार, 13 जून 2013

मधु सिंह : तुम न आये

          तुम न आये 



         सो गये सब दिये शाम के वक्त ही
         जिंदगी  जिंदगी  से  उलझती गई
         रात  आती  रही   रात  जाती  रही  
        तुम  न  आये  मगर सहर  हो गई

         चाँद  ढ़लता  गया  चाँदनी खो गई
        दिल धड़कता रहा ख्वहिशें सो गईँ
        पर  जुगनुओं   के  कहीं  गिर गये 
        तुम  न  आये  मगर सहर   हो गई 

         आज की बात थी आज की रात थी 
         कल की क्या नहीं  देखा  है किसने
         वक्त को भी  हजारों  पर  लग गये
         तुम  न  आये  मगर  सहर   हो गई

        धड़कने दिल की यूँ हीं धड़कती रहीं
        चूड़ियों  की  खनक  कहीं  खो  गई
        पायलें  पाँव  की  बेड़ियाँ  बन  गईं 
        तुम  न  आये  मगर सहर   हो गई

        बिंदिया  माथे  की  कहीं  गिर गई
        मेरे  होठों की  सारी  हँसी  खो गई
        सपने   सारे  धरे  के  धरे   रह गये
        तुम  न  आये   मगर सहर  हो गई

        बेबसी मेरी तुमने कभी सोची नहीं
       न   संदेस  घुंघरुओं  के  तुमने  पढ़े
       दिल की धड्कन यूँ ही धड़कती रहीं
       तुम  न  आये  मगर  सहर  हो गई

        अब  कहानी  मेरी   होने  चली  है
       आखिरी   आस   आखिरी   साँस है
       न आये ही  तुम  न  खताएँ  बताईं
       आखिरी  जिंदगी  की  सहर हो गई

                               मधु "मुस्कान "  


      
      

     
    

11 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद उम्दा..... वाह वाह वाह

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  2. नादाँ था बेचारा दिल ही तो है ,हर दिल से खता हो
    है उसका भी बेचारा दिल ही तो था :) दर्दे दिल को हवा देती सुन्दर रचना

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  3. उम्दा प्रस्तुति..बहुत बधाई..

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  4. बहुत सुंदर अहसासों की बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ! बहुत बढ़िया रचना !

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  5. वाह . बहुत उम्दा प्रस्तुति

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  6. भावमय और सजीव अहसास कराती रचना...शब्द जिन्दा हो गये और दिल को छू गये
    पर तुम न आये सुबह से शाम हो गई

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  7. बेहद शानदार रचना..
    सुन्दर और हृदयस्पर्शी रचना..

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  8. सुन्दर प्रस्तुति भावप्रधान रचना " दिल की धड्कन यूँ ही धड़कती रहीं तुम न आये मगर सहर हो गई

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  9. बहुत सुन्दर शव्दों का चुनाव सशक्त भाव बेहतरीन पंक्तियां ..............शव्दों के बारे में जितना भी कहा जाय कम ही होगा ............. सो गये सब दिये शाम के वक्त ही
    जिंदगी जिंदगी से उलझती गई
    रात आती रही रात जाती रही
    तुम न आये मगर सहर हो गई

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  10. अत्युत्तम |साधुवाद |

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