रविवार, 30 जून 2013

मधु सिंह: कोई फूल खिले न खिले

           कोई फूल  खिले न खिले



        कुछ उसकी अना थी,कुछ उसका  गरूर था 
        यूँ   हीं   ख़त्म   नहीं   हो   गये   सिलसिले

        ज़िन्दगी  बहुत  उदास   -उदास   लगती है 
        गर  ज़िन्दगी  में न  हों थोड़े शिकवे -गिले

        ज़बां  है   की   ख़ामोश   खुलती  नहीं कभी
        हाय ये दिल भी क्या की सम्हाले न सम्हले
      
        आये   तो  यूँ   कि  न    जायगें   अब  कभी
        गये   तो   ऐसे   गये   ले   खामोशियाँ  चले

        मैंने  काट   ली  जुबां  अपनी   जिनके लिए
        फ़िर  वो   अब   कहीं   मिले   की   न  मिले

        यादों   में   अक्श   उनकी  सूरत  है मचलती
        खिल गये जख्म सब कोई फूल खिले न खिले

                                  मधु "मुस्कान"

      

      
         
                                    

4 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िन्दगी बहुत उदास -उदास लगती है
    गर ज़िन्दगी में न हों थोड़े शिकवे -गिले
    वाह ! बहुत सार्थक सोच

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  2. यादों में अक्श उनकी सूरत है मचलती
    खिल गये जख्म सब कोई फूल खिले न खिले

    मिलते हैं ज़िन्दगी में ऐसे भी मुकाम वाह बहुत खूब कहा आपने

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  3. बहुत सुंदर ग़ज़ल की अभिव्यक्ति .......!!

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  4. tum gaye sab gaya..koi apni hi mitti tale dab gaya....umda!

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