सोमवार, 16 दिसंबर 2013

मधु सिंह : रूपसि !

       


             रूपसि !


       चाह तुम्हें जिस भ्रमर की रूपसि  !     
       वह  बना  अजन्मा  भटक  रहा है 
       मधुर  मिलन  के  सपन   सजाये 
       बन प्रसव  पीर  वह तड़प  रहा  है 
      
       कभी  ओढ़  सपनों  में  तुमको
       कभी बिछा  के अपने सपन में
       नयन  सेज  पर  पुष्प   सजाये
       भटक  रहा   है  नील  गगन  में ||2||

       जपती  जाओ  लिए सुमिरिनी 
       मन का मनका बिखर न जाए
       यौवन  की  सुरभित  घाटी  से 
       रूठ कहीं मधुमास रूठ न जाए ||3 ||

       दिखी  न  अब तक  वसन्तानिल
       घन- सावन कहीं  सूख  न जाए 
       सजा के  रखना  सेज  गुलाबी 
       कहीं   यामिनी  गिर  न जाए  ||4 ||

       कैसी  यह  कामना  ,बिलासिनी 
       यह  कैसा  वैषम्य  नियति का 
       खिल न सकी कलिका नयनों में
       कैसा यह दुर्भाग्य  नियति का  ||5 ||
        
       भूषण- वसन  कुसुम  कलिका के
       कहाँ  खो  गये , किस  मरुवन में
       क्यों सो गये नयन सेज़ के मोती
       भ्रामरी  हँस न सकी मधुबन में ||6 ||

       अपलक नयनों से  क्या  देख रही
       झांक  रही किस  माधवी  कुंज में
       खो  गई  कहाँ  नव प्रभा रश्मियाँ
       क्यों तिमिर विहंसता प्रभा पुंज में ||7  ||
       
        जलता   रहा   रक्त   आहुति  में  
       पर  तुम  न  बोली  ,यह  मौन क्यों
       अरी पगली ,बता पगली, बोल कुछ
       बन विधाता , रोना  भाग्य पर क्यों ||8 || 

      कड़कती क्यों नहीं तुम दामिनी बन
      उस  अजन्मा   की  लिए  चाह  तुम
      न देखो  तुम घटा  बन  सखी, बरसो 
      बन प्रतीक्षित  भ्रमर की  चाह  तुम ||9 ||
     
     क्यों  न  फट जाती छाती  तेरी 
     क्यूँ  न पी लेती गरल के घूँट  तुम
     निर्भया  बन ,चीर दो छाती गगन की  
     उतारो उस अजन्मा को धरा  पे तुम  ||10 ||
     
      सखि ,उड़ो आज तुम छू लो  अम्बर  
      जी  भार  नाचो  झूम  - झूम  कर  
      सखि , तृप्ति  तुम्हें  मिल जाएगी 
      उसके बहुपास में  चूम -चूम  कर  ||11||
  
                              मधु  "  मुस्कान"
     

       

     
   
     
     
     
     
     

     
     
     
     
     

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

मधु सिंह : हे कपोतिनी ! तुम सुनो आज

 

   
       हे कपोतिनी, तुम सुनो आज  !


       बन कपोत प्रेमी तेरा जब   , डैनें   गुम्बद  पर लहराएगा
       गिर -गिर कर तेरी बाँहों में वह आशिक तेरा कहलाएगा

       जरा गिरा ले पट  घूँघट के ,और सजा  ले सपन नयन में
       इतिहास के स्वर्णिम पन्नो में इक नया नाम जुड़ जाएगा

       नहीं मौन ,इतिहास सजग है,लम्हों को सदियाँ लिखने को
       तुम  नूरजहाँ   बन   जाओगी ,  वह   सलीम   कहलाएगा

       उलट जरा इतिहास के पन्ने ,एक नज़र तुम उसपर डालो
       क्या फिर सलीम  को  जिंदा  दीवारों  में  चुनवाया जाएगा

       चीख पड़े न कब्र अकबर की , रो  न पड़े  मुमताज बेचारी
       ताज महल इस दुनियां में फिर इक नया बनाया जायेगा

       नीरव नभ के वो दीवानें .जब  बाँहों में  गिर तुम  इतराओगे 
       रे कपोतिनी ,पत्थर की जगह   तेरे  दिलको  तरसा जायेगा  

       

                                                                          मधु " मुस्कान "

      
  
     
  
     
     
   
     
     
       

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

मधु सिंह : विशालाक्षा (8)


   
विशालाक्षा



उषा काल की लाली  से पहले
लिए हाथ शिव का प्रसाद तुम
दिशि पश्चिम प्रयाण तुम करना 
भोले  शिव को  कर  प्राणाम तुम

लिए व्यथा तुम  ह्रदय कमल में
हर्षित मन  विन्ध्यन गिरि जाना
माँ काली के  चरण कमल में
नत मस्तक हो शीश नवाना

कर परिक्रमा माँ काली  की 
निर्जनता की छांव तले 
कन्दमूल फल भोजन होगा 
स्नेहिल माँ   के  पाँव तले 

मगर न  होना विचलित पथ से
बीत  न जाए  लग्न हवन की  
सावन   कहीं  बरस  न  जाये 
आग न बुझने पाए हवन की 

अभय प्रयाण सफल हो तेरा 
सकल कामना  फलित हो मन की 
निर्जनता  के  महा तिमिर में 
वन उड़ना  तुम ज्योति  हवन की 

लेकर अनिल किरीट भाल पर
बन झंझानिल  उड़ना होगा
हटा गगन  के मेघ पंथ से 
ले गति अवाध चलना होगा 

तीर्थराज नव  गंतव्य तुम्हारा 
एक नहीं त्रय माओं का संगम 
गंगा यमुना विलुप्त सरस्वती
का दृश्य दिखेगा बड़ा विहंगम 

प्रयाग राज की महिमा अपार 
सकल मनोरथ पूरण होंगें
मातायें स्वागत गान करेंगीं 
द्वार -द्वार पर तोरण होंगें  



              मधु "मुस्कान"















                                               

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

मधु सिंह : नीर पिपासित



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 नव गुलाब की मोहक सुगंध सी

 तू समा गई तन मन जीवन में
 कविते, तृषावंत मैं भटक रहा हूँ
 तड़प-तड़प कर सकल भुवन में ||1||

धन्य धन्य वो कवि हैं जिनकी

कविताओं में झांकी बनकर
तुम झांक रही अपलक नयनों से
नीर पिपासित सरिता बनकर ||2||

सूखी सरिता ,सूखे सागर

रीते पनघट , प्यासे गागर
खेल रही मरुधर आंगन में
बन कर धूल कणों का सागर ||3 ||

जगा तीब्र मरीचि के सपने

पंख हीन खग सा व्याकुल मैं
वार चुका तन मन जीवन धन
बन दीन अकिंचन आकुल मैं||4 ||

नहीं  कोई  दानी  है जग में

कौन अधर रस पीने ने देगा
कौन साथ मिल कर रोयेगा
क्या नखत पूर्णिमा जीने देगा ? ||5||

कर धारण कौपीन वस्त्र मैं

लिए विपंची घूम रहा हूँ
बना ह्रदय पाषाण शिला मैं
कविते, गिरी गह्वर में दूंढ रहा हूँ ||6||

कुटी नहीं बन पाई  जग  में

युक्ति एक क्या कई बनाया
कुपित देव की शाप शिखा ले
सेज चिता  की स्वयं सजाया  ||7||

गुंजन काम देव का देखो 
बना भ्रमर  वह विहंस रहा है 
कमल   सारीखे    होठों  से 
मादक रस बन बरस रहा है  ||8||

अर्ध तृप्त उद्दाम  वासना  
खेल रही  है  नेजों पर 
रस से भरी  जवानी  देखो 
तड़प रही है  सेजों पर  ||9||

सूली ऊपर  सेज  पिया की  

कैसे अभय प्रयाण करूँ 
जल रही  फसल  यौवन  की  
चढ़  कैसे  रसपान  करूँ  ||10||





(विशालाक्षा की अगली कड़ी अति शीघ्र )



                     मधु "मुस्कान" 












बुधवार, 27 नवंबर 2013

मधु सिंह : विशालाक्षा (7) चर्चा जारी है



विशालाक्षा 

 

स्वागत अभिनंदन  भी  होगा
पथ पथिक और सब देव मिलेंगें
मार्ग    नया   होगा  अनजाना
नभचर   नए  अनेक   मिलेंगें

मन  में  हो  गंतव्य  तुम्हारा
मात्र यक्ष  हो लक्ष्य  तुम्हारा
नहीं कहीं  तुम राह भटकना
हो  पावन   गंतव्य   तुम्हारा

छोड़  मोह माया की दुनिया  
अपलक हो  गंतव्य तुम्हारा
श्रवण  मास  आने  के पहले
हो सम्पूरण मंतव्य तुम्हारा

चल  कैलाश  पहुचना  काशी
विश्वनाथ  के  दर्शन  करना
ले पुनः चरण  रज़  शंकर के
माँ   गंगे   का  पूजन  करना

सांध्य  आरती  की  बेला में
जब गर्जन हो घंट -घडे का
साथ साथ तुम भोले शिव के
नृत्य तांडव  अविरल करना

कशी  के  घाटों पर चल- चल
दिव्य ज्योति के दर्शन करना
मधु मिश्रित समिधा ले तुम
पूजन  नमन  हवन   करना

तीन  लोक  में  न्यारी काशी
हैं  बसे  जहाँ  साधू सन्यासी
धूल  वहां  की  लगा के माथे
बन  जाना  उनके उर  वासी

जलाभिषेक शिव का करना
संकट मोचन के दर्शन करना 
कशी  की  पावन  नगरी  में 
प्रेम भाव  सब अर्पित कारना 

                    मधु "मुस्कान" 

क्रमशः.....
















सोमवार, 25 नवंबर 2013

मधु सिंह : चर्चामंच के विद्वान चर्चाकारों

 
  चर्चामंच   के  विद्वान   चर्चाकारों 
  एवम्  ब्लॉग  जगत के  रचना कारों 
  "विशालाक्षा -6"  पर  प्रतुल  जी  के 
  साथ    बहस  जारी   है  आप अपना 
  मत    एवम्   पक्ष  रख  मेरा  मार्ग  
  दर्शन  अवश्य  करें  कृपया एक बार 
  विशालाक्षा 6 की टिप्पणी पर पधारें 
                       
        
     कहाँ बनेगा कुण्ड हवन का 

      कहाँ  बनेगा कुण्ड हवन का 
          कहाँ जलेगी  ज्योति प्यार की 
          कहाँ   लगेंगें  बचन  के फेरे 
          कहाँ लगेगी  गाँठ प्यार की 
          बोलो-बोलो  कुछ तो बोलो 
          बोलो मिलन कहाँ पर होगा 

           कौन   बनेगा  जीवन साथी 
           कहाँ  सजेगी   डोली  तेरी 
           कौन भरे  सिन्दूर माँग में 
          पायल  खनकेगी  कब तेरी
          बोलो-बोलो  कुछ तो बोलो 
          बोलो मिलन कहाँ पर होगा 

          
           आज  तुम्हे  बतलाना होगा 
          कहाँ सज़ेगी सेज मिलन की 
          तरु तरुवर की  घनी छाँव में 
          या   पलकों   के   आँगन  में
          बोलो-बोलो  कुछ तो बोलो 
          बोलो मिलन कहाँ पर होगा 


          वन उपवन के  वातायन में 
          दूर  कहीं  आकाश गगन में 
          नील कमल की पंखुड़ीयों पर
          सुरसरिता   की  लहरों  पर
          बोलो-बोलो  कुछ तो बोलो 
          बोलो मिलन कहाँ पर होगा   

          कहाँ जलेगी  प्यार की समिधा 
          पंडित  कौन  पढ़ेगा  पोथी  
          जीवन की सुरभित घाटी में 
          कौन करेगा  मंगल  गायन 
         बोलो बोलो   कुछ तो बोलो 
         बोलो  मिलन कहा पर होगा 

         लगन  मुहूरत  भी तो होगी 
         होंगें पंडित  और  पुरोहित 
         कौन  करेगा  कन्या  दान  
         कौन भरेगा  गोद तुम्हारी 
         बोलो-बोलो  कुछ तो बोलो 
         बोलो मिलन कहाँ पर होगा 

         प्रणय निवेदन कौन करेगा 
         कौन   करेगा  आ  आलिंगन 
         जूही गुलाब की कलिओं से 
         कौन   करेगा  उठ अभिनन्दन
         बोलो - बोलो कुछ तो बोलो 
         बोलो मिलन कहाँ पर होगा 

         घूँघट  पट  जब  और  खुलेंगें 
         कौन   करेगा   तेरे   दर्शन 
         कमल   सरीखे  होठों   का 
         कौन करेगा  भाऊक चुम्बन 
         बोलो -बोलो  कुछ तो बोलो 
         बोलो मिलन कहाँ पर होगा 
           

                         मधु "मुस्कान"
          
                       
           
       

 







  

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

मधु सिंह : विशालाक्षा (6 )

   


विशालाक्षा


गले लगा हंसिनी को अपने
विशालाक्षा  फफ़क पड़ी 
देख यक्ष के मन-बिम्बों को 
ज्वाला उर की भड़क पड़ी 



बड़े प्यार से लगी वो कहने 
सुनो विरहिणी  सुनो हंसिनी 
चित्रकूट जाना है तुमको 
है  पता राह का तुझे हंसिनी !

बोल पड़ी तत्काल हंसिनीं 
नहीं  नहीं मैं नहीं जानती 
कहाँ किधर किस ठौर बसा है 
मैं देश- दिशा तक नहीं जानती

 नयन -सेज पर उसके  आँसूं 
 अश्रु -रुदन का भास्य बन गए 
 अविरल प्रवाह की धार सरीखे
  जीवन का पर्याय बन गये 

 रोक अश्रु वह बोल पड़ी 
 राह -डगर मैं दिखला  दूंगीं 
 मंज़िल दूर कठिन  हैं लेकिन 
 आकाश मार्ग मैं बतला दूंगीं 

 सुनो ध्यान से बात हंसिनीं 
 बालक रवि के आने से पहले 
 ले ब्रत तुम गंतव्य का अपनें
 चलना पूरब की लाली से पहले

 कर प्रणाम भोले शिव को तुम
 ले माँ पार्वती के चरण धूल को
 चल पड़ना तुम ब्रम्हमुहूर्त में
 कर कोटि नमन शिव के त्रिशूल को

 पथ कंटक से मुक्त न होगा
 पग-पग पर अपार संकट होगा
 गर्ज़न मेघ का भीषण  होगा
 कहीं धवल तड़ित नर्तन होगा

 झंझावातों का ताण्डव होगा
 नभ विचरित यामिनी होगी
 तुहिन कणों  के माथो पर
 चंचल चपल  दामिनी होगी

पर मार्ग तेरा अवरुद्ध न होगा
मलयानिल भी क्रुद्ध न होगा
झंझानिल की  ध्वनिया होंगी
भीषण  गर्ज़न  नर्तन होगा

                 मधु "मुस्कान

क्रमशः .............