मंगलवार, 13 मई 2014

मधु सिंह : हथियार होना चाहिए




 (ब्रिटेन यात्रा की पूर्व संध्या पर)
  
               

आप  के  ते   हुस्न  को  हथियार  होना  चाहिए
नजर  जब  भी  उठे  ज़िगर के पार होना चाहिए

समझा  दे  अपनी  यादों  को  रोज़ छुट्टी न मांगें
इश्क  के  तकवीम* में  न  इतवार  होना  चाहिए

आप  के  दिल  में  मैनें  अपनी  दुनिया बसा ली
आप  को  तो  नाखुदा  की  पतवार होना चाहिए

इश्क मकसद ,इश्क मंजिल,  इश्क ही मेरा ख़ुदा
आप के  हुस्न को तो परवरदिगार  होंना चाहिए     

आप की आँखोंने  आकर मुझसे अकेले  में कहा
आप   के    इंकार   को   इकरार  होना  चाहिए

आजिज़  आ  गई  मैं  ए  जिंदगी  तुझसे  बहुत
जिंदगी में भी कहीं  कोई  किरदार  होना चाहिए

 *तकवीम  -- केलेंडर                                    मधु "मुस्कान"


गुरुवार, 8 मई 2014

मधु सिंह : तेरी गंध बसी जो तन - मन



भूल गए ऋतुराज मुझे क्यों
अधर बन गए प्यासे गागर
स्वप्न बीच जो भी सुन्दर था
बन न सका प्रीति का सागर

ठोकर  मार भाग्य को फोडूं
या निज जीवन तज उड़जाऊँ
जीवन की इस सरस घड़ी में
किसको अपनी व्यथा सुनाऊँ

तेरी गंध बसी जो तन -मन
बोलो !कैसे उसे भूल मैं जाऊँ
होठ  तुम्हारे  छू न  सकी मैं
बन तितली   कैसे उड़ जाऊँ

नहीं खिल सकी कली चमेली
महक न सकी  बेल बेला की
सुख गई बिन खिले मालती
क्या बात करूँ जूही मेला की

मिल न सकी छाया कदम्ब की
सावन बना चिता की ज्वाला
मीरा  के  अधरों  से  लिपटा
जीवन हुआ हलाहल प्याला

जले   दिये    थे  करें   उजाला
छलके  हाथो  में  मधु प्याला
बनी अकिंचन  भटक  रही मैं
लिए ह्रदय मिलन की ज्वाला

चूम  न  सकी पावन अधरों को
नहीं भज सकी प्यार की माला
जीवन जला कि ये  मत पूछो
कि  जैसे जले  सुहागन बाला

छिन -छिन लगे कि कोई जैसे
बुला रहा  ले मधु  कर  प्याला
नखत अमावास ले कर उतरा
अपने   हाथो  विष का प्याला

                    मधु "मुस्कान "




सोमवार, 5 मई 2014

मधु सिंह : कब अश्रु मेरे सम्मानित होंगें


 कब अश्रु मेरे सम्मानित होंगे  , कब मुझको याद किया जाएगा
 जीवन के इस महातिमिर में, कब  नव घृत-दीप जलाया जाएगा

 अपमान- पत्र  की  माला  पहने , कहाँ - कहाँ   मैं   भटक  रही  हूँ

 युग -युग  से अपमानित प्रतिमा  पर ,कब पुष्प चढाया  जाएगा

 लिख - लिख अश्रु गीत मैंने , पोथी  एक नहीं कितनी भर डाली

 कब  गीत   मेरे   गाये  जायेंगे, कब  मेरा  नाम  लिया    जाएगा 

नहीं जल  सका  दिया  प्यार  का ,  जीवन  झंझावत  बन  गया
कब अरमानों  की  सेज  सजेगी ,  कब   हार  पिन्हाया  जाएगा

सूली  ऊपर  सेज  पिया की , नहीं  मिलन  की  आस  बची अब
कब खुशिओं की समिधा महकेगी ,कब सूली पे चढ़ाया जाएगा
 
                                                            मधु "मुस्कान"

 










रविवार, 4 मई 2014

मधु सिंह : ज़िगर देखते हैं





 इक नज़र  जब  उनकी नज़र देखते हैं

 सर झुकाकर के अपना ज़िगर देखते हैं 


 दिले – पासदारी  की  ज़ुरूरत  बहुत है

 मौजे -दरिया  में मौजे -खतर देखते हैं 


 क़दम  बढ़ न जाएँ  कहीं उनकी तरफ

 जिनके सीने  में अपना ज़िगर देखते हैं 


 है बहुत  रिश्ता  पुराना धुंआ आग का

 अपना जलता हुआ हम ज़िगर देखते हैं


 है जल्वा  मोहब्बत का महफ़ूज दिल में

 आग पत्थर  से निकले जिधर देखते हैं


 पासदारी – रखवाली 


                मधु “मुस्कान”

  

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

मधु सिंह : महफूज़ चिंगारी रहे




ता- कयामत  हुश्न  की महफ़ूज़  चिंगारी रहे
दिल पे काबिज आपके हुश्न की मुख्तारी रहे

कल ही तो मैंने तुमको आँखों से छू के  देखा
लबों  पे मुस्कुराहट का सिलसिला जारी रहे

मेरी पलकों तले  तुम्हारा  दिल  धड़कता है
दिल पे काबिज़ आपकी हमेसा ज़मींदारी रहे

पत्थर तरास  कर  मैंने एक तस्बीर बनाई है
कह दो हदों को तोड़ कर कायम अदाकारी रहे

खिलने लगे  हैं  फूल  गुलाबों  के जिश्म पर
खुशबू  तुम्हारे जिश्म की ता - उम्र  तारी  रहे


                            मधु "मुस्कान"





















मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

मधु सिंह : होठों की नमी

हालात  जिंदगी   के  हद  से  गुज़र गए हैं
पलकों  पे  ख्वाब  के  शोले  बिखर गए हैं

चाहा  था  चूम लूँ  होटों  की  नमी  उनके
होटों से आग के कई दरया गुज़र गए हैं

जुगनू जो  चमकते थे  रातों  के अंधेरों में
रूख मोड़ के वो जुगनू जाने किधर गए हैं

तन्हाईओं का पहरा ख्वाबों पे लग गया है
पर खाबों के परिदों के कबके बिखर गए हैं 

गोया कहीं  खो गया  मेरी यादों  का समंदर
लम्हात  जिंदगी   के   कबके  ठहर गए  हैं

चाहा था जिसे उम्रभर वो ही न मिल सका
चाहतों के चाक -चाक  पुरज़े बिखर गए हैं



                                  मध् "मुस्कान "


 






सोमवार, 3 मार्च 2014

मधु सिंह : राजस्थान के स्वर्णिम अतीत की ओर

मरुधर  के  स्वर्णिम  अतीत में, हे  पथिक ! तुम्हारा  स्वागत  है 
आओ   नमन  करे   धरती  को , आतिथ्य ,पाहुना  ,अभ्यागत है  

                   राजस्थान की यात्रा 5 मार्च से 15 मार्च 2014

चित्र:Bird eye view of Umaid Bhawan Palace, Jodhpur.JPG
 गूगल से साभार 

जोधपुर

जाग - जाग  मेवाड़  बता दो  
बीरों  का   इतिहास सुना दो 
लोक नृत्य  संगीत  कला के
गौरव वैभव की कथा सुना दो 

पत्थर की छाती पर निर्मित 
छुपा   हुआ  दुर्गों  का  वैभव 
इतिहास तू पन्ने खोल आज 
जोधा  का  इतिहास  बता दो 

एक नहीं , अगणित आघातों 
प्रतिघातो  की  व्यथा समेटे 
हे मेवाड़ !उठो कुछ तो बोलो 
तोड़  मौन, सब कथा सुना दो 

खो  गया  कहाँ मण्डोर दुर्ग ?
हे ऋषि मांडव !चुप  क्यों हो ?
मध्यकाल   राठौड़   बंश  के
रामायण का  भाष्य बता दो 

मेहरांन गाढ़ी का भग्नावशेष 
स्तब्ध ! खड़ा क्या देख रहा ?
बिकट दुरूह शैलों पर निर्मित 
दुर्गों   का   इतिहास  बता दो 

क्यों मौन खड़ा जालौर आज ?
नागौर,सिवाना खो गया कहाँ ?
हे स्वाभिमान की वसुधा बोलो 
कैसे पग धोऊ ?  मुझे बता दो 

दृढ़  निश्चय ले  निकल पड़ी मैं 
बीरों की  धरती  का  पग  छूने
अपने  अतीत  की कथा खोजने 
लिखूं कलम क्या  मुझे बता दो 

                     मधु "मुस्कान"