न वो आए न नींद आई
न वो आए , न नींद आई , न ख्वाब आए
कौन है मेरी पलकों में इस कदर समाया हुआ
रस्में - सितम एक नहीं हज़ार थीं लेकिन
है कोई लबे- खामोशिओं से ज़ुल्म ढाया हुआ
बात दीगर है कि न वो सनम है न ख़ुदा मेरा
है वो क्या मेरा जो इस तरह है दिल पे छाया हुआ
गुज़री मेरी भी और उसकी भी , गुज़र भी जाएगी
है ज़िगर पे चोट कहीं वो गहरा बहुत खाया हुआ
शब-ए- इंन्तिज़र ,सहरे-जुनूं के ज़लज़ले तो देखो
है किसी यार की आँखों में जाम पी के आया हुआ
है क्या हुआ उसे, मेरे दिल पे हज़ार ख़राबी गुज़री
कि दिले-कू-ए-यार में है एक ज़लज़ला आया हुआ
मधु "मुस्कान"


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