सोमवार, 1 दिसंबर 2014

मधु सिंह : इश्क मेरा रूहानी है




 आप के दरबार में आप की दुआ के खातिर 
                 



इश्क   मेरा   रूहानी है 
राहे- ख़ुदा    कहानी है 

बन बैठा मैं रब का बंदा
रब ही मेरी कहानी है 

सांसो की धड़कन में मेरे 
रब की लिखी कहानी है 

इश्क राम रहमान इश्क है 
सज्द:गाहों  की कहानी है      

सज्जाद हूँ मैं दरगाहों का 
दिल दरगाहों की कहानी है 

रब ही जिश्म है रब ही रूह है 
रूह-ए-परवर की कहानी है 

 सच है यह दुनिया वालों 
 आना जाना ही कहानी है 

                 मधु "मुस्कान "







बुधवार, 12 नवंबर 2014

मधु सिंह : नाम इक फ़क़ीर का बदनाम रहे




     थोड़ा वक्त मिला और मैं हाज़िर
  

फ़लक से चादनी उतरे औ  सरे बाम रहे 
सआदत उनको मिले खराबी मेरे नाम रहे         

हम आश्ना रहें  उनकी  दिल फरेबी से     
तहजीब जिंदा रहे  औ दुआ -सलाम रहे

हजार  पर  लगें  उनकी बलंदिओं को
महफूज रिवायत रहे,न जेर-ए-दाम रहे

 हूज़ूम यारों का  उनकी  गली  से गुज़रे 
औ  नाम  इक  फ़क़ीर का बदनाम रहे 

उनकी  महफ़िल  उन्हें   मुबारक हो
लाख  अँधेरा मेरे  घर सरे -शाम  रहे

                                      मधु "मुस्कान"

सआदत--- अच्छाई
आश्ना---जानकार
रिवायत---परम्पराएँ 
जेर-ए-दाम--- फन्दे में

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

मधु सिंह : हे मौन तपस्वी ! हे यतिवर !






 थोड़ा समय मिला और मैं आप की अदालत में
      दीपावली की शुभकामनाओं के साथ 
                        पुणे से


हे मौन  तपस्वी   !  हे यतिवर  ! हे दिग्दिगंत  !  हे  कन्त  मेरे 
तड़प  तड़प  हम  कहो  करें  क्या ? हे   अंतर्मन   के  संत  मेरे
 
 जीवन  की  मधुरिम बेला में 
 विरह सेज कंटक बन चुभते 
 यौवन की सुरभित घाटी में
 प्रणय दीप जल जल बुझते 
 बोलो  बोलो  कुछ  तो बोलो 


हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प तड़प हम कहो करें क्या  ?हे  अंतर्मन   के   संत    मेरे
 

 अब  रहा  नहीं  जाता  मुझसे
 अब  सहा  नहीं  जाता  मुझसे
 छुप  गए  कहाँ  निष्ठुर कठोर 
 उठता न भार सांसों का मुझसे  
 बोलो   बोलो   कुछ  तो  बोलो




  हे  मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
  तड़प तड़प हम कहो करें क्या ? हे  अंतर्मन   के   संत    मेरे
 
 
 देख   प्रात   नभ   की   लाली
 लिए  हाथ   पूजा  की   थाली
 गिरी गह्वर  मैं  भटक रही हूँ
 यौवन उपवन से  रूठा  माली
 बोलो   बोलो   कुछ  तो बोलो


हे   मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन   के   संत    मेरे
 
और कहें क्या  धरा  न धंसती
प्रणय  कलह का  अंत  नहीं हैं
तिमिर  बीच  जीवन उलझा है 
क्या इस जीवन का अंत यही है
बोलो   बोलो  कुछ  तो   बोलो


हे   मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे
 
न होता राख न,जलता जीवन
पल -पल युग पर भारी लगते
रोम   रोम  से  धुआँ  उठ  रहा
विरह अनंत पीड़ा बन जलते
बोलो   बोलो  कुछ  तो बोलो



हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या  ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे
 
 
बेला  नहीं   मिलन की  आई 
क्यों  चुप हो ? हे  कन्त  मेरे
उमड़   घुमड़   रोती  तरूणाई
हे  चिर यौवन  के   संत  मेरे 
बोलो   बोलो  कुछ तो बोलो


हे  मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे 

अविदित नहीं मेरी कुछ तुझसे
अन्दर ही  अन्दर  ही  घुलते हैं 
अरे बिवस  है  कितना  जीवन 
क्यों  न   पाँव   बेड़ी  खुलते हैं
बोलो   बोलो  कुछ  तो   बोलो

                       
हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे 

 हाय ! छिन गया जीवन  मेरा 
 प्रणय  पीर   का  छोर  नहीं है  
 तड़प  तड़प जीना भी क्या  है 
 जीवन  में  अब  भोर  नहीं है
 बोलो   बोलो  कुछ  तो  बोलो


हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे 

टूट  गईं   आशा  की   किरणें
तिमिर बन  गया जीवन  मेरा 
देखूं   कहाँ  भोर   की  किरणें 
लिखा  भाग्य  में  नहीं  सवेरा  
बोलो   बोलो  कुछ  तो  बोलो 


हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या  ? हे  अंतर्मन   के  संत  मेरे 


                                                  मधु "मुस्कान "

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

मधु सिंह : क्यों संगीने उगाई जाती हैं ?



   

फूलों   की  महकी  घाटी में 
क्यों  लाशें  बिछाई जाती  हैं
केसर की  क्यारी  में बोलो
क्यों संगीने उगाई जाती हैं 

क्या हुआ आज इस घाटी को
क्यों आग लगी इस  माटी को
क्यों चश्मों से आसूं  झरते हैं
क्यों चूल्हों में सपने जलते हैं

आजादी    की    वर्षगांठ   पर
क्यों भाल तिरंगें का झुकता है
क्यों आँख  बंद  कर दिल्ली
कुम्भकरण बन  कर सोता है 

क्यों डल  झील की छाती पर
ऐ के सैतालिस ढोई जाती हैं
तड़ तड़ गोली की आवाजें सुन 
क्यों   आँखे   रोई   जाती  हैं

गुलमर्ग    से   पहलगाम तक
क्यों गोलों के जमघट लगते हैं 
छम्ब  कारगिल औ राजौरी में
क्यों रोज भोर में घर जलतें हैं

विस्थापन  की पीड़ा से पूछो
क्यों  लोग  भगाए   जाते हैं 
क्यों   संगीनों    के  साये  में
ज़ज्बात   जलाये    जाते हैं 

चेनाब  की चंचल लहरों का
क्यों  रंग खून जैसा दिखता 
क्यों  हज़रतबल  के भीतर 
है संविधान अपना  जलता 

उर लिए आज इस पीड़ा को 
मैं अलख जगाने  निकली हूँ 
सारी  दुनियाँ  को  सच्चाई 
मैं  आज  बताने निकली हूँ 

चंद  सरफिरे  आ   बैठे  हैं 
अब कश्मीर की छाती पर 
आग  लगाने  को  आतुर ये
बैठे हैं मर्यादा की थाती पर 

इनको अब समझाना होगा 
रस्ता  सही  दिखाना होगा 
मानवता  के  बीजमंत्र  को 
इनको  आज पढ़ाना होगा 

जो  इनके  हितैसी  हो  बैठे 
वो  अपना होश  हैं  खो बैठे 
है ये कठमुल्लों की साजिस
जो  पाक  समर्थित  हो बैठे 

 ऐसे जाहिल कठमुल्लों को 
उपदेश  सुनाने  निकली हूँ
धू -धू  कर जलती घाटी को
मैं सन्देश सुनाने निकली हूँ

मैं   पीड़ा   हूँ  संबोधन की 
मैं हुंकार  हूँ  उद्बोधन की 
मैं  इन्हें जताने निकली हूँ 
इनको समझनें  निकली हूँ 

पता नहीं  इन कठमुल्लों को 
है  जोर बाजुओं में  कितना 
इन चंद सिरफिरे मुल्लों को 
रस्ता  दिखलानें निकली हूँ 

मैं मरघट की  खामोसी को
नव गीत सुनाने  निकली हूँ 
द्रास कारगिल और छम्ब को 
मैं हुंकार सुनाने निकली  हूँ

करते जो  अपमान  देश का 
गाने    खून   का   गाते  हैं 
इन   खूनी  गद्दारों  को  मैं
खवरदार  करनें  निकली हूँ

सुनो सुनो  हे कश्मीरी  भाई 
तुम रोज रोज सपनों  में आते
क्यों रूठ गये अपनों से अपनें 
मैं  अपनों को मनानें आई हूँ

चलो आज हम प्यार से बोलें
नब्ज़ हकीकत की हम तोलें
अपनें  दिल की  धड़कन को 
मैं   तुम्हें   सुनाने   आई  हूँ 

खून खराबे में  क्या रखा है 
नहीं  खून की  होली खेलो 
लिया  हाथ  में चंदा मामा  
मैं ईद मनाने आई हूँ ,मैं ईद मनाने आई हूँ .........

   विदर्भ यात्रा के पूर्व आखिरी रचना 

   लगभग  तीन  माह  के प्रवास पर
                        मधु  "मुस्कान "


  
    


    

    
        
     
      
     
     
      

सोमवार, 22 सितंबर 2014

मधु सिंह : चेनाब की लहरों का हम नीर बदल देंगें





तस्वीर   बदल   देंगें   तक़दीर   बदल   देंगें 
चेनाब  की लहरों  का  हम  नीर  बदल  देंगें

दुश्मन  के   इरादों  की  तस्बीर   बदल देंगें
यूँ  तो   हम  कश्मीर  की  जागीर  बदल देंगें

संगीनें जो उग रही है केसर की क्यारिओं से 
लिख   प्यार के नग्मों  को  तहरीर बदल देंगें 

दोस्त  बन  के  निकले है दुश्मनों को बदलनें 
हम  दुश्मनों  के  दिल की   ताबीर बदल देंगें 

इतिहास के  पन्नो से  मिटा खू की स्याही को
हम  चेनाब  की  घाटी  की  तकदीर बदल देंगें

फ़ौलादी    इरादे   हैं  ज़ज्बात  भी  फ़ौलादी हैं
दुश्मन  के  निशानों  के  हम  तीर  बदल देंगें

कश्मीर की वादी  में निकले  हैं सज  धज  कर
उनके  नापाक  इरादों  के हम पीर * बदल देंगें  

*धर्मगुरु
                                      मधु "मुस्कान "






रविवार, 21 सितंबर 2014

मधु सिंह : जंग जिन्दगी से जारी है





 जंग   जिन्दगी   से  जारी है 
अब    हौसलों    की  बारी  है

 ये  इरादों  की  उड़ान  है  मेरे
मेरे   ख्वाहिशों  की   बारी है 

मौत  लाख   खफा  हो  ले तू 
अब   जिंदगी   की   बारी  है 

न  कह वक्त  सब पे  भारी है
ये  हौसला  वक्त  पे  भारी है  
  
पंख  फड़फड़ाने लगे  है आज
अब  ऊँची  उड़ान की  बारी है

न  पकड़   बैसखिओं  को  तू 
कट गये  बाजुओं की बारी है 

रूख तूफ़ान  का मोड़ देंगे हम

अपने  इरादों  से  जंग जरी है 

जिसे  मौत  समझ  डर रहा तू 
सच में वो जिंदगी की सवारी है 

आज जी भर के जिंदगी जी लो
आज मेरी,कल तुम्हारी बारी है               मधु "मुस्कान "