मंगलवार, 21 जुलाई 2015

मधु सिंह : शलभ आ न पाया निशा क्रूर थी



सुधी पाठकों के स्नेह  और  आशीष की  असीम  आकांक्षा 
के  साथ  लगभग  तीन  माह   के  यूरोपीय   भ्रमण  पर 
 
 












 इसे मत कहों तुम समंदर का पानी 
है  इसमें  छुपी आँसुओं की कहानी

दीप अंगणित निशा वक्ष पर थे जलाए
विरह के झकोरों ने जिसको बुझाए

शलभ आ न पाया निशा  क्रूर थी
मिलन की घड़ी भी बहुत दूर थी

दामिनी थी कड़कती निशा मध्य ऐसे 
बक्ष में   हो   रहा   हो विस्फोट जैसे

 रुदन  ही  समंदर रुदन  ही कहानी 
न पढ़े इसको दुनियाँ दो बूँद पानी



                          मधु "मुस्कान "

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मधु सिंह : इक नया जख्म खिला गया कोई










याद फिर किसी की दिला गया कोई
इक  नया  जख्म  खिला गया कोई

जरा मौसम की  मेहरबानियाँ देखो
अब के गर्मी में घर जला  गया कोई 

खीँच    कर    दिल पे  लकीरें  गहरी 
नींद  उम्र  भर  की  चुरा गया कोई 

वादा   था चाँद का बाम पर आने का 
जुगनुओं को बैसाखी थमा गया कोई 

इक प्यास ले तमाम उम्र सहरा में रहे
और आग  सहरा में लगा  गया कोई 

इक  खता क्या  जो लम्हों  ने  किया 
के  ता उम्र की  सज़ा  दे  गया  कोई

                            मधु "मुस्कान "

                         




रविवार, 22 मार्च 2015

मधु सिंह : तू जिधर जायगा मैं उधर जाऊँगी



इश्क में टूट कर गर बिखर जाउँगी
ये बताओ  जरा  मैं  किधर जाउँगी

तेरी चाहतों  को खुदा  मैंने माना
तुझे  पास  पाकर   मैं निखर जाउँगी

आईना तेरी आँखों का सामने देख कर
 देखते -   देखते  मैं  सवंर जाउँगी
  
 कहाँ  से कहाँ ला दिया आशिकी नें  
तू जिधर जायगा मैं उधर जाऊँगी  

दूरियाँ इस कदर दरम्याँ जो रहीं 
टूट डाली कली सी बिखर जाऊँगी 


                                     मधु "मुस्कान "      

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

मधु सिंह : इश्क मेरा रूहानी है




 आप के दरबार में आप की दुआ के खातिर 
                 



इश्क   मेरा   रूहानी है 
राहे- ख़ुदा    कहानी है 

बन बैठा मैं रब का बंदा
रब ही मेरी कहानी है 

सांसो की धड़कन में मेरे 
रब की लिखी कहानी है 

इश्क राम रहमान इश्क है 
सज्द:गाहों  की कहानी है      

सज्जाद हूँ मैं दरगाहों का 
दिल दरगाहों की कहानी है 

रब ही जिश्म है रब ही रूह है 
रूह-ए-परवर की कहानी है 

 सच है यह दुनिया वालों 
 आना जाना ही कहानी है 

                 मधु "मुस्कान "







बुधवार, 12 नवंबर 2014

मधु सिंह : नाम इक फ़क़ीर का बदनाम रहे




     थोड़ा वक्त मिला और मैं हाज़िर
  

फ़लक से चादनी उतरे औ  सरे बाम रहे 
सआदत उनको मिले खराबी मेरे नाम रहे         

हम आश्ना रहें  उनकी  दिल फरेबी से     
तहजीब जिंदा रहे  औ दुआ -सलाम रहे

हजार  पर  लगें  उनकी बलंदिओं को
महफूज रिवायत रहे,न जेर-ए-दाम रहे

 हूज़ूम यारों का  उनकी  गली  से गुज़रे 
औ  नाम  इक  फ़क़ीर का बदनाम रहे 

उनकी  महफ़िल  उन्हें   मुबारक हो
लाख  अँधेरा मेरे  घर सरे -शाम  रहे

                                      मधु "मुस्कान"

सआदत--- अच्छाई
आश्ना---जानकार
रिवायत---परम्पराएँ 
जेर-ए-दाम--- फन्दे में

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

मधु सिंह : हे मौन तपस्वी ! हे यतिवर !






 थोड़ा समय मिला और मैं आप की अदालत में
      दीपावली की शुभकामनाओं के साथ 
                        पुणे से


हे मौन  तपस्वी   !  हे यतिवर  ! हे दिग्दिगंत  !  हे  कन्त  मेरे 
तड़प  तड़प  हम  कहो  करें  क्या ? हे   अंतर्मन   के  संत  मेरे
 
 जीवन  की  मधुरिम बेला में 
 विरह सेज कंटक बन चुभते 
 यौवन की सुरभित घाटी में
 प्रणय दीप जल जल बुझते 
 बोलो  बोलो  कुछ  तो बोलो 


हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प तड़प हम कहो करें क्या  ?हे  अंतर्मन   के   संत    मेरे
 

 अब  रहा  नहीं  जाता  मुझसे
 अब  सहा  नहीं  जाता  मुझसे
 छुप  गए  कहाँ  निष्ठुर कठोर 
 उठता न भार सांसों का मुझसे  
 बोलो   बोलो   कुछ  तो  बोलो




  हे  मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
  तड़प तड़प हम कहो करें क्या ? हे  अंतर्मन   के   संत    मेरे
 
 
 देख   प्रात   नभ   की   लाली
 लिए  हाथ   पूजा  की   थाली
 गिरी गह्वर  मैं  भटक रही हूँ
 यौवन उपवन से  रूठा  माली
 बोलो   बोलो   कुछ  तो बोलो


हे   मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन   के   संत    मेरे
 
और कहें क्या  धरा  न धंसती
प्रणय  कलह का  अंत  नहीं हैं
तिमिर  बीच  जीवन उलझा है 
क्या इस जीवन का अंत यही है
बोलो   बोलो  कुछ  तो   बोलो


हे   मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे
 
न होता राख न,जलता जीवन
पल -पल युग पर भारी लगते
रोम   रोम  से  धुआँ  उठ  रहा
विरह अनंत पीड़ा बन जलते
बोलो   बोलो  कुछ  तो बोलो



हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या  ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे
 
 
बेला  नहीं   मिलन की  आई 
क्यों  चुप हो ? हे  कन्त  मेरे
उमड़   घुमड़   रोती  तरूणाई
हे  चिर यौवन  के   संत  मेरे 
बोलो   बोलो  कुछ तो बोलो


हे  मौन  तपस्वी  ! हे  यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे 

अविदित नहीं मेरी कुछ तुझसे
अन्दर ही  अन्दर  ही  घुलते हैं 
अरे बिवस  है  कितना  जीवन 
क्यों  न   पाँव   बेड़ी  खुलते हैं
बोलो   बोलो  कुछ  तो   बोलो

                       
हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे 

 हाय ! छिन गया जीवन  मेरा 
 प्रणय  पीर   का  छोर  नहीं है  
 तड़प  तड़प जीना भी क्या  है 
 जीवन  में  अब  भोर  नहीं है
 बोलो   बोलो  कुछ  तो  बोलो


हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या ?हे  अंतर्मन  के   संत   मेरे 

टूट  गईं   आशा  की   किरणें
तिमिर बन  गया जीवन  मेरा 
देखूं   कहाँ  भोर   की  किरणें 
लिखा  भाग्य  में  नहीं  सवेरा  
बोलो   बोलो  कुछ  तो  बोलो 


हे   मौन  तपस्वी  ! हे   यतिवर ! हे दिग्दिगंत !  हे  कन्त मेरे
तड़प  तड़प  हम  कहो करें क्या  ? हे  अंतर्मन   के  संत  मेरे 


                                                  मधु "मुस्कान "